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भाषाभाषी साहित्य
युद्धबिराम थारु (कृष्णराज र्सवहारी/थारु भाषाको कविता)) - [2007-02-07]

पोर बर्षसाल अघनमे

मोर भैने जन्मलाँ ।

भर्खर माओबादीन्के

तीन महिने युद्धबिराम ओराके

थप एक महिने युद्धबिराम

हुइल रहे टब्बे ।

ओहे ओर्स

अपन भैनेक् नाँउ ढैलुँ

युद्धबिराम थारु ।

मोर एक संघरिया

धाप मर्लां मही,

वाह क्या \'युनिक\' नाँउ

ओ, ऊ अंग्रेजीमे

डायरी लिख्लाँ

बर्थ अफ सिजफायर थारु ।

भैने बाह्रे पौह्रे लग्लाँ दिनेदिन

के कहे कि यी

चार मैन्हक लर्का हो ।

लकिन जैसे युद्धबिरामके बारेम्

तरे उप्पर हुइ लागे

भैने फेन लल्याक लुलुक

हँस्टी खेल्टी लर्का बेमार ।

बहिन्या बनासे गरियाए

यी दादु फेन,

बिना कामक् नाँउ ढारल भैनेक्

ना टे यी देशमे

कब्बु युद्धबिराम हर्ुइ,

ना तोर भैने चिक्कन रही ।

समयके खेल

यी सालके अघन पाँच गते

माओबादी-सरकारबीच

शान्ति संझौता हुइल

भैने किल्कारी मारे लग्लाँ ।

विडम्वना,

माघक् बाद, भैने फेन दोसरे

बिमार परे लागल बटाँ

तर्राई जर्लक् धुँवाले

भैनेक् आँश् अइटी बतिन्

भर-भर, भर-भर ।







कृष्णराज र्सवहारी







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